" इश्क़ ....."
दिल के बाज़ुओं में बंद दर्द क्यों हुज़ूर है ...
मेरी जवान हसरतों का कौन ले रहा है जायज़ा ...
पिघल के काँच सा ये कह रहा है बामुलायज़ा ...
रौशनी की आढ़ लेके रौशनी से दूर है ...
खौलती रगों में ठण्डी बर्फ़ सा सुरूर है ...
भीगने की चाह थी तो बारिशें भी कम हुईं ...
माँगी जब भी धूप गर्मियाँ भी थक के नम हुईं ...
हवा की खिड़कियों पे इश्क़ सर पटक के चूर है ...
साँस हो चुकी ग़ुलाम जिस्म बस फ़ितूर है ...
नींद भी सिमट के करवटों में ख़ाक दम हुई ...
देखने पर हर जगह निगाह सख्त ग़म हुई ...
ज़ुबां पे बेड़ियों का ज़ायक़ा शहद खजूर है ...
आवारगी ये है नयी तड़पना भी ज़रूर है ...
इश्क़ बेक़सूर है तो किसका फिर क़सूर है ...
दिल के बाज़ुओं में बंद दर्द क्यों हुज़ूर है .....!!
************** विक्रम चौधरी ******************
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