" शर्म की मचान ....."
युद्ध की बिसात पर तमाशा महज़बीन हो
हो अगर मुक़द्दरों में कशमकश इबादती
फिर क्यों अल्लाह राम के बसेरों की तौहीन हो ...!
हो सके तो कर शिकार बैर के आरम्भ का
कुण्ठा का तू कर संहार नाश कर कुसंग का ...!
जन्म के सवाल पर इरादा मैं से क्षीण हो
मृत्यु के भूचाल पर बाशिंदा दुःख से हीन हो ...
जड़ तू ख़ोज ले उबलते इन्सां के प्रहार की
फिर क्यों सरहदों में धरती बेवजह ही दीन हो ...!
बाण भर के बाँध मूँह भेद के प्रचार का
एकलव्य बन के शंखनाद कर विचार का ...!
शस्त्र की ग़ुहार पर सन्देशा रक्तहीन हो
कर्ण के क़रार पर भड़कता जाँनशीन हो
हो अगर सिकंदरों में होड़ कुछ इनायती
फिर क्यों चन्द टुकड़ों पे दरिन्दगी शौक़ीन हो ...!!
**************** विक्रम चौधरी ********************

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