" मृगतृष्णा ....."
बेदम गुनाह को रहने दो
मातम को स्याह बहने दो
गिद्ध की निगाह बदलने दो
छल पे लहू को चढ़ने दो
बैठी है तप के मृगतृष्णा
आखेट मुझमे पलने दो ....!
आत्मा की कोख़ का लिबास है ये अनछुआ
आदमी के बोझ का हिसाब आज कम हुआ
मुट्ठी में राख़ थमने दो
आतिश भरम को चखने दो
रोती है जल के जगतृष्णा
आदेश रब का जगने दो ...!
अक्षरों की मौत का फ़साद है ये ग़ुमशुदा
माहिरों के जोश का निबाह आज कम हुआ
घुटती पनाह को ढलने दो
सागर का दम पिघलने दो
हक़ है पहेली का फँसना
अज्ञेय मुझको बनने दो ....!!
********* विक्रम चौधरी **********

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