" कागा अलख जगा दे ...."
भोर खुले तो शोर मचा दे
पिया बिरह की हूक मिटा दे
तू आमद की आस बँधा दे
कागा अलख जगा दे .........!
सपना सोणा साँच करा दे
इश्क़ अधूरा पार लगा दे
कागा अलख जगा दे ........!
जिगर पे ताने साँप सरीखे डस डस जहरी होवें
पीर के भाग पड़ी मायूसी रोज दोपहरी रोवे
लाल सिन्दूरी मांग रचा दे
हाथ की चूड़ी हरी मँगा दे
कागा अलख जगा दे ........!
लिपट रही माटी के तन से जोगन सरबस खोवे
खाल पे साजण नाम लिखा के रात अधूरी ढोवे
चाँद से घूँघट आज करा दे
शर्म की चादर मोहे उढ़ा दे
हद मीरा का जोग तू माने
क्यों तू मेरी तड़प ना जाने
जाके उजड़ा हाल सुना दे
पी के पथ से मेल करा दे
कागा ... अलख ... जगा ... दे ...!!
*********** विक्रम चौधरी *************

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