" काल ....."
अंगार हलाहल उतरी
है जीभ धरी बेसबरी ...
दाँत धरा पे काल धरे
बेहद सुन्दर श्रृंगार करे ...
देखी मानस की चोट हरी ...
झट मुहँ से गाढ़ी लार गिरी ...
ना धीर धरे ना देर करे ...
बे आहट खटका वार करे ...
रब देदे मुझको एक छड़ी ...
जो मारूँ सरपट काल मरे ...
आकाश कहाँ करवट खावे ...
धरती रख मौन ही थर्रावे ...
बहते बहते रुक जाए पवन ...
सागर भी प्यासा बल खावे ...
अग्नि ढूँढ़े बेदोष हवन ...
घुट घुट धुँए में जल जावे ...
ना खौफ़ डरे ना कौल छटे ...
बे ढाल ही इन्सां युद्ध करे ...
क्या ढूँढे जग में सोन छड़ी ...
सोने के तन में काल फिरे ...
जी भर के छोड़े नार शरम ...
जी भर के ओढ़े पीर भरम ...
है दर मौला का जी भर का ...
जी भर के दौड़े कोस करम ...
इच्छा से खुद ही छल जाए ...
भिक्षा में अंतर कर जाए ...
काल से बच के चाल चले ...
पर बच के चाल कहाँ जाए ...
ना भीड़ हटे ना नीड़ घटे ...
जंगल वीराना आप कटे ...
ना जाने अंत है कौन घड़ी ...
तिनके तिनके में काल बँटे ...!!
******* विक्रम चौधरी ********

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