" शूद्र ...."
तप के शून्य में जो ढल गया वो रूद्र है
थक के धूल में जो पल गया वो शूद्र है ...
सूखे बन्दा गर्द सा प्यासा है गुनाह
मुर्दा हर्फ़ों में लिखी जीने की वजह
साँस की पनाह क्यों शर्म ओढ़े ना
कारवाँ चलने दो जलने दो दास्ताँ ...!
बैठा मेरी देह पे दानव लाज रूह सब निगल गया
नस्लों की बाज़ी में नक्शा रहम का देखो बदल गया
एक तरफ़ क़ानून है राजा एक तरफ़ क़ानीन प्रजा
अस्ल हुए गोरख धंधे जिस्मों के दाव की मिली सज़ा ...!
अन्धा है मासूम ये राही इंद्र की थाप से पिघल गया
देख ना पाया नामकरण पाखण्ड की दौड़ में उछल गया
पानी के पथ कोई ब्राह्मिन कोई जगत में शूद्र बना
घाट घाट ताबूत जड़े एक बूँद पे मौत का जाल बुना ...!
बहलाने को मर्म उठे मरहम आँसू में बदल गया
अन्तर्यामी ज़िन्दा हो कर ज़हर के घूँट सा दहल गया
एक पहर मरने की चाहत एक पहर श्रृंगार सजा
बेघर पाँव हुए नंगे काँटों के मन का गाँव बसा ....!
कैसा है वैकुण्ठ का दर्जी नाप तौल में उलट गया
सिलता है पतलून एक पर कद आदम का बिगड़ गया
एक फ़लक अंगूर का दाना एक फ़लक अंगार जना
तख़्त चढ़े पोथी पन्ने इन्सान ये खरपतवार बना....!!
******************* विक्रम चौधरी *********************

No comments:
Post a Comment