" आरम्भ ....."
आरम्भ सर्व चरित्र मोदक ब्रह्म अर्पण हो
प्राचीन बुद्धि सशक्त बोधक अंश निर्गुण हो ......
कारण अथाह बहरूपिया भय से मुख़ातिब है
आदम व्यथा की भूल में खुद ही मुहाजिर है
दक्ष बन मै से निकल
आहूति में कर तू पहल ......
आरम्भ सर्व चरित्र मोदक ब्रह्म अर्पण हो .......
दान के उत्थान का नज़दीक परचम है
खोखले इंसान का ये दीन दर्शन है
वृक्ष बन जड़ से निकल
नक्काशियों में ना तू ढल ......
सानिध्य संत प्रकाण्ड शोधक वंश सदगुण हो ....
आरम्भ सर्व चरित्र मोदक ब्रह्म अर्पण हो ...........
मोक्ष के प्यासे धड़ों का कंठ प्यासा है
पा सका ना मोक्ष जोगी अध्लुटा सा है
हश्र बन मिट के संभल
ना वक़्त के अधरों पे चल ......
निर्मोही कर्म विशुद्ध साधक वस्त्र दर्पण हो ....
प्राचीन बुद्धि सशक्त बोधक अंश निर्गुण हो .........
पहरन फ़क़त रंगरेज़िया शय की तिजारत है
आध्यात्म के अध्याय में मै की इमारत है
दर्स बन डर से निकल
ना मोम सा बन के पिघल ......
आरम्भ सर्व चरित्र मोदक ब्रह्म अर्पण हो
प्राचीन बुद्धि सशक्त बोधक अंश निर्गुण हो ......
...................... विक्रम चौधरी ..................................

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