“ मेरी भोर फँसी है बंदिश में ….”
नगरी नगरी घूमें मानुस
बेचें बड़े मोल की बाँसुरिया
दुखड़ा पूछें बाँटें जग सुख
करें लाग लगाई मन्तरिया
छलनी से खींचें पानी
रीते कूए पे आके
का जाने मन का ठानी
भीगे ना बदरी रो के
है क़िस्मत की बेईमानी
हर रिंद की एक कहानी
करमन की धार पे चढ़ के
पावें सब एक निशानी
कोई जी की ठेस ना जाने
करे मन की अन्तर्यामी
मेरी भोर फँसी है बंदिश में
सूरज पे जाल बिछा
मेरी लाज लुटी है मंदिर में
बीरन रे आन बचा
मध् के मधुशाले भर भर के डोले माया मतवारी
धर्मांनन्द के अन्धेपन में नदिया मैली कर डारी
रोटी पे चढ़ी चाँदी की परत अब भूख भरे किलकारी
मोती अँखियन के पी के मैं जिन्दड़ी बन हंस गुज़ारी
मेरी डोर बँधी है ग़र्दिश में
सूरत कोई और दिखा
मेरी रूह घिरी है साज़िश में
मेरी देह से मोहे छुड़ा
पथरीले पंख लिए पंछी एक टक आकाश को ताके
तिरकोण भये गाड़ी पहिये पर वक़्त की दस्तक नापें
सीसे के भये डाली पत्ते ख़ुद अपने अक्स में झाँकें
शर्मीली नार हुई नंगी दर्पण में तन को ढांके
सब ओर मची अफ़रा तफ़री
क़ायदे सब आज बदल गए
बेडौल हुयी नापा तौली
धागे सब नाप के खुल गए
मेरी जीत घटी है रंजिश में
अब हार पे हार चढ़ा
मेरी मौत बसी मेरी ख्वाहिश में
मेरी ज़िद पे धूल गिरा
*********" विक्रम चौधरी "***********
नगरी नगरी घूमें मानुस
बेचें बड़े मोल की बाँसुरिया
दुखड़ा पूछें बाँटें जग सुख
करें लाग लगाई मन्तरिया
छलनी से खींचें पानी
रीते कूए पे आके
का जाने मन का ठानी
भीगे ना बदरी रो के
है क़िस्मत की बेईमानी
हर रिंद की एक कहानी
करमन की धार पे चढ़ के
पावें सब एक निशानी
कोई जी की ठेस ना जाने
करे मन की अन्तर्यामी
मेरी भोर फँसी है बंदिश में
सूरज पे जाल बिछा
मेरी लाज लुटी है मंदिर में
बीरन रे आन बचा
मध् के मधुशाले भर भर के डोले माया मतवारी
धर्मांनन्द के अन्धेपन में नदिया मैली कर डारी
रोटी पे चढ़ी चाँदी की परत अब भूख भरे किलकारी
मोती अँखियन के पी के मैं जिन्दड़ी बन हंस गुज़ारी
मेरी डोर बँधी है ग़र्दिश में
सूरत कोई और दिखा
मेरी रूह घिरी है साज़िश में
मेरी देह से मोहे छुड़ा
पथरीले पंख लिए पंछी एक टक आकाश को ताके
तिरकोण भये गाड़ी पहिये पर वक़्त की दस्तक नापें
सीसे के भये डाली पत्ते ख़ुद अपने अक्स में झाँकें
शर्मीली नार हुई नंगी दर्पण में तन को ढांके
सब ओर मची अफ़रा तफ़री
क़ायदे सब आज बदल गए
बेडौल हुयी नापा तौली
धागे सब नाप के खुल गए
मेरी जीत घटी है रंजिश में
अब हार पे हार चढ़ा
मेरी मौत बसी मेरी ख्वाहिश में
मेरी ज़िद पे धूल गिरा
*********" विक्रम चौधरी "***********

No comments:
Post a Comment