" चौसर के पासे ......"
चाल चलें चौसर के पासे
दाव पे है भगवान् .......
ओढ़ गरज अन्जान मुसाफ़िर
बन बैठा शैतान .......
शंख ना गूंजे भोर अलख में
संत करें भय दान .......
साँच में सुलगा कौन कवि है
लेख लिखे फ़रियाद .....
घोर जगत की माया फूटी
घट घट भये बेईमान .......
सरपट इन्सां कोस चलत में
खेल रचे खूंखार .....
चित्रकूट की कोट कचेहरी
लत पत भयी हैरान .......
असमत लूटी अंध गली ने
नरकश भयी संतान .....
छोड़ के रोवे सांप कांचली
जंगल भये श्मशान .......
चाल चलें चौसर के पासे
दाव पे है भगवान् .......
******** विक्रम चौधरी ********

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