" जगत बेशरम ....."
क्या ठनी है ये इन्सां के मन में
बेबसी है क्यों माटी के तन में
अचरज है मेहमान फ़क़ीरी
बरबस है देहदान अखीरी
लाज अपनी ही छोड़े जगत बेशरम
बेचे आँसू के धारे रे बेचे करम ........!
माथे चढ़ के सजी तानाशाही
खुलती मुट्ठी करे जगहँसाई
खौफ़ ग़ुम है ज़मीं के हलक़ में
मौत चुप ज़िन्दगी की सनक में
बोझ अपना ही ढोवे बशर का भरम
भोर छुप के तू खोजे अरे बेशरम ....!
जश्न में अब्द की है बुराई
अर्थ में है अना की रिहाई
भाव कम कंचनी की ग़रज में
दाव हम कर्कशों की तरज में
दोष अपना ना ढूँढे अधूरा कदम
शोर कलयुग का बाँचे भगत बेशरम ...!!
************ विक्रम चौधरी **************

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