" संग मसीहा ....."
तप कर ताप हो जाने दे ..
जल कर ख़ाक हो जाने दे ..
बूँद बूँद तक खून की ..
उड़ कर भाप हो जाने दे ..
हो जाने दे मुर्द अक़ीदा ….हो जाने दे ….
हो जाने दे सुर्ख़ कलीसा ….हो जाने दे ….
जुड़ जाने दे अंत अनंत से ….
मिल जाने दे रूह बसंत से …..
" हो जाने दे संग मसीहा ...
हो जाने दे संग मसीहा ..."
संग मसीहा .. संग मसीहा .. संग मसीहा ..
ध्यान को मन से जुड़ जाने दे ..
सिद्ध सामरथ हो जाने दे ..
फ़ज्र - ए - इबादत हो जाने दे ..
दर्द ये बेघर हो जाने दे ..
हो जाने दे संग मसीहा …..संग मसीहा …२
उजड़े मुंड में खोटी माला सर्प कुंडली बन गयी ..
हलक में उतरी कैसी हाला ज़हर काँचली बन गयी ..
सुन्दर नील गगन की बेला रात अँधेरी कर गयी ..
देख स्वार्थ का ढोंगी रेला सर्द आत्मा पड़ गयी ..
मन जो लांघी पाप की रेखा ..
धर भागा झट आप नसीबा ..
पत्थर बन गयी बूँद सुनहरी ..
खंजर बन के डस गयी ..
तन खंडर भयो रे भारी .. 2
मिट जाने दे लुट जाने दे ..
मोहे अपनी खुदी से जुड़ जाने दे ..
साँच की लौ में जल जाने दे ..
हो जाने दे करम फ़क़ीरा ..
हो जाने दे संग मसीहा ....
अंतर्घट में बैठी ज्वाला भीतर भीतर डस गयी ..
धर्म छोड़ के इन्सां बस्ती भोग भरम में रम गयी ..
एक दाँत की काटी रोटी दूजे दाँत में बँट गयी ..
रोग भयी घनघोर ये माया खुनी काया रच गयी ..
घुट के बाँची कृष्ण की गीता ..
सोच रहे जग खूब ये जीता ..
मंस मरे नहीं लूट मची रे ..
झूठे ही अंसुअन धार बही ..
भये मूरख नर और नारी .. 2
थक जाने दे रुक जाने दे ..
अब स्वप्न की गाड़ी थम जाने दे ..
पाँव धरा पे धर जाने दे ..
हो जाने दे अर्ज कबीरा ..
हो जाने दे संग मसीहा ..
संग मसीहा संग मसीहा ..
संग मसीहा संग मसीहा ......!!
********* विक्रम चौधरी ********

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