" दुनियाँ ....."
कैसी है दुनियाँ
ये है बज़्म कैसी
ख़ुद पे हँसे ख़ुद मज़ाकों के जैसी ....!
हमे मुफ़्लिसी से शिक़ायत ना थी यूँ
हमे खालीपन से ग़िलाज़त ना थी यूँ
मग़र ज़िन्दगी में हुई भीड़ कैसी
शक़ से घिरे फ़ाका - मस्तों के जैसी ...!
हर एक बात में फ़र्क है ये भी समझो
ना समझो कि है फ़र्क बातों में मेरी
ये शम्मां है काज़िब के आँगन में कैसी
जो रौशन है सूरज के नखरों के जैसी ...!
है चरखे में कतने की बारी हमारी
आ पहुँचा दिलाने जुलाहा सवारी
है मिटने की शौहरत में ये भीड़ कैसी
लतीफ़ों में लत्मा - क़सीदों के जैसी ....!!
************* विक्रम चौधरी ***************

No comments:
Post a Comment