" सवाल ....."
ख्वाहिशों के कटघरे में अंत एक सवाल है
छलने की फ़िराक़ में मसीहा क्यों बेहाल है
ठोकरों के ज़ोर में फ़ितूर कैसा पल गया
धूल से उठा ग़ुबार धूल में ही मिल गया
काग़ज़ी बशर की अन्जुमन का फैला जाल है
ख्वाहिशों के कटघरे में अंत एक सवाल है ....!
जो बन्द है क़िताब तो है नाम से ख़ुदा
खुल के पन्नों ने किया है होश फ़ाकता
स्याही के असर का मय चढ़ा ख़ुमार धुल गया
मस्ती - ए - जुनूं में ज़िन्दा शख्स देखो जल गया
चोट है हरी तो ज़िन्दगी की ये मिसाल है
ख्वाहिशों के कटघरे में अंत एक सवाल है ....!
वो जीत है हराम जिसपे रंग - ओ - बू चढ़ा
मिले जो हार भीख में तो जंग फिर बढ़ा
मिट्टी के धड़ों का दम कटार बन के चल गया
चेहरों की तलाश में ये चेहरा ख़ुद में ढल गया
बाँटने को हाथ में सभी के अब गुलाल है
ख्वाहिशों के कटघरे में अंत एक सवाल है ....!!
************** विक्रम चौधरी ******************

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