" नागँवार ....."
अज्र की फ़सल पे कटता जज़्म नागँवार है ...
बख्श दे नज़र हलाल की ग़ुबार छा गया
उम्र थक चुकी जलाल की मलाल आ गया ...
राह बद्सुलूकियों की हर तरफ़ बुलंद हैं
उन्स है तवायफ़ी ये मजमा शोरबंद है ...
खोल दो ये तन बाज़ार में उबाल आ गया
सिक्कों की खनक में छनता लो दलाल आ गया ...
जिस्म है नुमाईशी ये कौरवों का द्वन्द्ध है
शीत सी अहिंसा में ये कैसा घोर अंध है ...
रोटियों पे घाव मलता कौन आबदार है
चक्कियों से खून रिसता कैसा ये उधार है ...
मैं ख़ुद के ही अधीन हूँ
धर्म - जात , कर्म - काण्ड
पढ़ के जग से दीन हूँ ...
जरार हूँ अवाम का
करार हूँ सलाम का ...
कबीर हक़ रहीम हक़
मैं मुर्तज़ा मुक़ाम का ...
क्यों नौंचने लगी हैं मुझको मेरी ही ये अज़मतें
क्यों कौंधने लगी हैं सब बनावटी ये निसबतें ...
जिल्द सी बदलती ज़िन्दगी की ये पुकार है
अम्न की सुराही पे ये किसका अख्तियार है ....!!
**************** विक्रम चौधरी ********************

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