Monday, 30 January 2012

" माजरा "



















" माजरा "

आग और पानी की ख़त्म होती हिम्मत का माजरा कोई देखे..
फूल और पलकों की सख्त होती फ़ितरत का हादसा कोई देखे.. 

होश है मलंगों सा टूटती पतंगों सा..
कोप के तमाशों में सूखते कारिंदों सा....
कारवां कोई देखे .... माजरा कोई देखे .......

मै मौन हूँ कठोर हूँ ..
अज़ान पे विभोर हूँ ..
ना कायरों सा पल सका ..
विचार से अघोर हूँ..
इन्सां का ये मेला है,
ये खेल किसने खेला है..
घृणा , अहं , वैमनस्य ,
क्रोध का ये रेला है...

बैर के शिकंजे में कसते सुर्ख मतलब हैं..
होड़ के बाशिंदे में मरते अर्ज़ मरतब हैं..

मै फ़र्त हूँ मै गर्त हूँ ..
विधान पे भी शर्त हूँ ..
ना ठोकरों सा बन सका ,
धुंए में घुलता गर्द हूँ ...
परदों का झमेला है ,
ये खेल किसने खेला है..
नस्लों की भरी दुकां में
अक्स फिर अकेला है...

भीड़ के परिंदे ने लांघे सारे परबत हैं ..
छोड़ के धरम देखो भागे सारे मज़हब हैं .....

*********विक्रम चौधरी **********

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