" भस्म "
रंग भस्म हो गया
धुंध पे सवार हो के रिंद भस्म हो गया ...
मन का ये प्रपंच मध् की नींद भर के सो गया ..
अर्थ के जुनूं में जन ललाट रक्त हो गया ..
अश्वमेध यज्ञ पहुंचा द्वेष की कमान पे ..
नर्तिकी बनी अहिंसा भाग्य भस्म हो गया ......
ज्ञान का प्रचंड ताप थम के भी थमा नहीं ..
वर्ण के कपाल पे मनुष्य का पता नहीं ..
भागीरथ की उजली गंगा सहमी एक सवाल पे ..
नाम से बिका है इन्सां साक्ष्य भस्म हो गया ......
ध्यान का घमंड चढ़ते योग पे झुका नहीं ..
राम धुन की बांसुरी पे राम से जुड़ा नहीं ..
हिम की ताल शिव का दंगा भड़का एक ख्याल पे ..
स्वार्थ में बसी तपस्या साध्य भस्म हो गया .......
नर्तिकी बनी अहिंसा भाग्य भस्म हो गया ......!!
****************विक्रम चौधरी ***********************

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