Monday, 30 January 2012

" मिर्ज़ा ग़ालिब " .....























" मिर्ज़ा ग़ालिब " .....

क्या करे फ़रियाद ग़ालिब ..
अश्क़ बेचे उम्दा ग़ालिब..
कह गए उसको सुखनवर .
लुट के भी न रोया ग़ालिब...!!

आम के रस में रहा वो आम ही बन कर चला ..
शाम हांसिल थी उसे प्यालों की भाषा में बहा..
तख़्त - ओ - दम ना ओढ़े ग़ालिब..
फ़र्द - ए - हक़ ना छोड़े ग़ालिब ..
कह गए उसको सुखनवर ..
मिट के भी ना खोया ग़ालिब ..!!

गोंद सी चिपकी लबों पे ग़ालिब - ए - कलमों की आब ..
बंदा ग़ैरत - ए - इल्म की मिसरी में बांटे इश्क - ए - ताब ..
कहकहों में ज़िंदा ग़ालिब ..
खुद ठगा खुद से ही ग़ालिब ..
कह गए उसको सुखनवर ..
शहद सा खंजर था ग़ालिब ..!!

वस्ल की चादर में हैरां नक्श था नौशा रक़ीब ..
दूर से तकते थे उनको ख़्वाजा - ए - हज़रत ग़रीब ..
बस गया रिन्दों में ग़ालिब ..
क़त्ल में फ़िर्दौस ग़ालिब ..
कह गए उसको सुखनवर..
क़िस्म - ए - गुर्बत दर्द ग़ालिब ..!!

मीर , मुफ्ती , ज़ौक ने ताने कसे थे शौक में ..
तन के तानों में रहा बेख़ौफ़ हो के " मिर्ज़ा ग़ालिब " .....!!

क्या करे फ़रियाद ग़ालिब ..
अश्क़ बेचे उम्दा ग़ालिब..
कह गए उसको सुखनवर .
लुट के भी न रोया ग़ालिब... !!

***** विक्रम चौधरी *****

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