" नौका ....."
चल उड़ा रे माझी नौका सात समंदर पार करा दे
ना मिलेगा मौका उड़ने का कश्ती पे पंख लगा दे
मन की गठरी का मोल भाव कम निकला है
रब की पतरी में भेद भाव का मसला है ......
चल उड़ा रे माझी नौका .......................................!
तोड़ के नींद क़बूतर एक पग पे तैयार खड़ा
जंग छिड़ी पिंजरे से क़तरा क़तरा खून बहा
अपनी हद भूला पंछी कैसा पगला है
पिछली काठी के घोर कर्म का बदला है ......
चल उड़ा रे माझी नौका .......................................!
भूत के झूठ का मंतर नटखट अंधड़ पाल चढ़ा
गंध उड़ी जिस्मानी भूतों का रुख डोल पड़ा
ख़ामोश ख़िलाफ़त के आग़ाज़ का हमला है
बिन बादल के बरसात पते का जुमला है ....
चल उड़ा रे माझी नौका .......................................!!
**************** विक्रम चौधरी ********************

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