" अनहद....."
तीनों लोकों की सरहद से ...
कोयल कूके और इतराए ...
दूर पपीहा झट शर्माये ...
नाच मयूरा हद बिसराये ...
तीतर चोर की बात सुनाये ...
कैसी ये मदमस्त पवन है ...
इंद्र के रथ से दौड़ लगाए ...
सुबह ठहरी आकर फ़ुर्सत से ...
भीगी बूँदों की पहरन से ...
मन का बोझ उतरता जाए ...
तन का रंग निखरता जाए ...
पंछी मुझ पर पंख लगाए ..
साँझ की चौखट राग सुनाये ...
उड़ जाऊँ मैं दूर गगन में ...
जी चाहे कोई देख ना पाए ...
शहद उठा घर के पनघट से ...
लिपट गया सूखे अधरों से ...
अंतर्मन तक भीगा जाए ...
बीती हार से हाथ छुड़ाए ...
झूठापन गल के ढल जाए ...
कुण्ठा बरबस आँख चुराए ...
लड़ जाऊँ मैं दोहरेपन से ...
अब कोई मुझे रोक ना पाए ...
पूछूँ मैं कारे कागा से ...
क्या कोई लाया तेरा संदेसा ...
आज लिखूँ एक ख़त मैं तुझको ...
माँगूँ कलम अपने अनहद से ....!!
********* विक्रम चौधरी ***********

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