" पंछी हँसे ....."
पंछी हँसे देखे जो दर्पण
इन्सां के जैसा ना देह दर्शन
उकता गया खानाबदोशी झेल कर
झुलसा गया इन्सां के हाथों खेल कर
अपना घरौंदा कर बैठा अर्पण ...
पंछी हँसे देखे जो दर्पण ...................!
एक ही काठी में बन्दा
ढोये चेहरों का पुलिन्दा
बनते मिटते खेल में
ख़ामोश रहता है दरिन्दा
इठला गया कोरी ख़याली बात पर
ख़प गया दोहरी तबीयत भाँप कर
सर से हटाया अपना ही दामन ...
पंछी हँसे देखे जो दर्पण .................!
खोजने निकला परिन्दा
अक्ल की दौलत का फन्दा
आँख भर कर रो पड़ा
देखा जो लतपत घोर धंधा
पछता रहा मानव पटल के हाल पर
जल पड़ा कुण्ठा की झूठी खाल पर
शतरंज है या है रंज कारण ...
पंछी हँसे देखे जो दर्पण ...............!!
*********** विक्रम चौधरी *************

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