" अनाम...."
अनाम की चिता नहीं
अनाथ का पिता नहीं
ख़गोल के रहस्य में
अनादि का पता नहीं ......
ख़याल की खरोंच पे फ़कीरियत शौक़ीन है
पर कटे परिंदे की उड़ान महज़बीन है
अर्ज़ियाँ तू लिख सही
भेज अपने घर कभी
अनर्थ के आवेश में
आधार का पता नहीं ......
काल की कलम पे ना तो राम ना रहीम है
जात से कबीर है ये कर्म के अधीन है
हराम की हया नहीं
आराम की दया नहीं
समाज के सदस्य में
समाज का पता नहीं ......
******* विक्रम चौधरी *******

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