" लापता ....."
खोने को है कुछ भी नहीं
पाने को है सारा जहां ....
है ज़िन्दगी के मायने में
चढ़ते सूरज का पता ....
जीने को है ज़िन्दा ज़मीं
उड़ने को फैला आसमां ....
फिर वक़्त के परवाज़ पर
मंज़िल खड़ी क्यों लापता ....!
चाहत में अपने ही निशाँ को ढूँढने की बात कर
कीड़े से पैदा रेशमी धागे पे तू गिरने से डर
पीने को हैं ग़म भी नहीं
हँसने में आता है मज़ा ...
फिर रौशनी के फ़र्श पर
क्यों है सवेरा लापता ........!
चलता भी है रुकता भी है साँसों का दम है एक सफ़र
ठण्डी पड़ी उम्मीद पर जलने की अब तू ला ख़बर
मरने को हैं मंज़र कई
मुद्दे पे मरना है अदा ...
फिर गाज़ियों की शान पर
नगमे हुए क्यों लापता ......!!
*********** विक्रम चौधरी *************

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