" नर्तिकी ....."
नर्तिकी बैराग ढूँढे अनहद हद भूले
माटी के बुत भी आज आदम संग झूमे ...
दोनों के मूँह की लार खूं के रंग घोले ...
मन बेढंग डोले ........................................!!
बादल की ओख लेके मेघा पल जावे
धरती को रूप देके माया छल जावे
पंछी भी देस देस दाने पर झूले ...
अपना घर भूले ......................................!!
फ़तवे का ज़ोर नारा हलकारा गावे
हँसने से पहले होंठ घुट के छिल जावे
नर्की सा काल आज सुर की नथ खोले ...
दर्पण संग डोले .......................................!!
झूठा बैकुण्ठ भाग्य बरबस ललचावे
तन की अँधेरी भूख मरघट बन जावे
दानी की चाल आज एक एक टक तौले ...
इच्छा पथ खौले ......................................!!
************* विक्रम चौधरी ****************

No comments:
Post a Comment