" सार ....."
अघोर सा विचार हूँ ..
पाखण्ड पे प्रहार हूँ ...
मैं अपने हाल मैं नहीं ..
मैं नीयति का का सार हूँ ...
ख़ुदा की आदतों के बीच उछला एक सवाल हूँ ...
ना मिल सका जवाब उलझी शाख पे निढाल हूँ ...
फ़क़ीर का दुलार हूँ ...
अज़ान की पुकार हूँ ...
मैं अपने हाल मैं नहीं ..
मैं नीयति का का सार हूँ ...
आकाश के उफ़ान का ठिकाना मैंने चुन लिया ..
मनुष्य के मकान का बिछौना मैंने बुन लिया ..
खुली नहीं है आँख फिर भी ख़ाब से लाचार हूँ ...
ख़याल के भँवर में डूबी कश्ती पे सवार हूँ ...
मैं अपने हाल मैं नहीं ..
मैं नीयति का का सार हूँ ...
कर्म की नसीयतों पे दौड़ता क़रार हूँ ...
मोतियों की लूट पे निशाद का शिकार हूँ ...
अघोर सा विचार हूँ ..
पाखण्ड पे प्रहार हूँ ...
मैं अपने हाल मैं नहीं ..
मैं नीयति का का सार हूँ ...
*********** विक्रम चौधरी *************

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