" धन्धा....."
ये धन्धा बड़ा ख़याली है
मीठी एक चाय की प्याली है
दो चुस्की भर का स्वाद भरा
बाक़ी उम्मीद से खाली है .....!
काग़ज़ पर सड़क बनायी है
गड्ढों की शामत आयी है
खा कर गारा , रोड़ी , पत्थर
नेता ने अलख जगायी है .....!
बीज पे कर की बारी है
फ़सलों की नज़र उतारी है
रोटी पर लिपटी कैमेस्ट्री
प्रोटीन की गोली खारी है .....!
सिस्टम की साख़ बिगाड़ी है
सदनों में चली कुल्हाड़ी है
है धर्म जात अब वोट बैंक
मज़दूर पे चढ़ी उधारी है .....!
तय करके बाँटी थाली है
हर नग पर एक मवाली है
हर भेस में रंगता भ्रष्टाचार
ईमान से इन्सां खाली है .....!
हो किसके हाथों राम धनुष
ये दुविधा देश ने पाली है
हों अन्ना या हों रामदेव
पर मुद्दा खड़ा सवाली है .....!!
******** विक्रम चौधरी ********

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