" मुझको पिला ..."
ज़हर पिला अमृत पिला ...
जो तू पिए मुझको पिला ...
हो बूँद बस वो साँच की ...
चाहे लड़ी हो काँच की ...
ना झूठ से ख़ुद को गिरा ...
ना झूठ तू मुझको पिला ...
साथ रख हर मर्म को
ग़ैरत ना जो शर्मिंदा हो ...
ख़ुद से ना जो पर्दा करे
उस शक्ल को हँस के खिला ...
अस्ल कर हर हर्फ़ को
सुनने को हर बाशिंदा हो ...
बिकने की ना कोशिश करे
ऐसी ख़ुदी मैं में मिला ...
तख्तों की हर ज़ुर्रत पलट
बाग़ी तू बन जब हो ग़लत ...
झुकने पे हक़ सूली चढ़े
ऐसा करम सर पे चढ़ा ...
तक़दीर को ख़ुद से मिला
मेरा भी दम मुझको दिला ...
ज़हर पिला अमृत पिला ...
जो तू पिए मुझको पिला ...!!
********* विक्रम चौधरी **********

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