" एक बन्जारा ....."
बोल मुसाफ़िर एक बन्जारा क्या गावे तूफ़ान में
बरस जा बदरी तोड़ के चुप्पी बूँद गिरा फ़रमान में
चाट शहद आलाप खिंचा है
दूर तलक आकाश बिछा है
उठा पटक है बदरी और आलाप की इस तक़रार में
मान गयी बदरी मेरे मौला बदली ख़ुद बरसात में
बोल मुसाफ़िर एक बन्जारा क्या गावे तूफ़ान में .....!
बगल में तुम्बा चिमटा लम्बा
चिलम की चटपट नापे खम्भा
भेस रचे जोगी अतरंगा
राख़ चखे घूमे अब नंगा
छोड़ के तीतर जंगल भीतर बैठा रेगिस्तान में
बोल मुसाफ़िर एक बन्जारा क्या गावे तूफ़ान में .....!
लपट उठा चूल्हे संग चँदा
रोट पके खावे हर बन्दा
बीज खिले उगले ना तिनका
प्यास दिखे फट जाए गंगा
धरे समाधी ले एक तारा बस जावे शमशान में
बोल मुसाफ़िर एक बन्जारा क्या गावे तूफ़ान में .....!!
***************** विक्रम चौधरी ***********************

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